AKHAND MISHRA

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"हां मैं गुमनाम होना चाहता हूं "

हां मैं गुमनाम होना चाहता हूं..


रंगमंच की दुनिया छोड़कर बस  
एकांत सी इक दुनिया में.. 
सुकून से भरपूर होकर 
बस सिमटना चाहता हूं.. 

चाहता हूं खुद को परखना 
उलझनों से परे रखकर...
कर्तव्यों से उन्मुक्त होकर
चाहता हूं खुद में खोना
केवल स्वच्छंद होकर..

बस की इतना दूर हो जाऊं..
जहां ना हो कोई गिले-शिकवे.. 
ना ही हो कोई शिकायत.. 
सिर्फ निश्चल शांति का 
एहसास पाना चाहता हूं..

                    हां मैं गुमनाम होना चाहता हूं...

जीवन की आपा-धापी से
व्यक्तित्व रूपी वापी से...
पूर्णतः निर्मुक्त होकर..
एकांत रूपी प्रकृति का
रसपान करना चाहता हूं...

                 हां मैं गुमनाम होना चाहता हूं...

क्षणिक भर की इस डगर में..
एक निडर और विरत सा 
व्यक्तित्व रखना चाहता हूं..
सच बोलकर बस मैं 
बदनाम होना चाहता हूं..

                  हां मैं गुमनाम होना चाहता हूं..

स्वार्थपरता की पहुंच से मैं दूर होना चाहता हूं..
कालु-कलुषित ओहदों से सुदूर होना चाहता हूं..
कुछ क्षण बस खुद को अब आराम देना चाहता हूं..

                ... हां मैं गुमनाम होना चाहता हूं..

          

          अखंड मिश्र 'एके'✍️
( स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित)

(नोट- लेखक के वास्तविक नाम के बिना कहीं भी रचना को लिखना या पोस्ट करना प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम 1957 के तहत दंडनीय है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)

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2 Comments

Swati chourasia

16-May-2022 04:33 PM

बहुत ही सुंदर रचना 👌

Reply

AKHAND MISHRA

21-May-2022 11:07 PM

हार्दिक आभार 💐

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